Wednesday, June 30, 2010
स्वाभिमान या रोटी
पाठकों आप सब से यह सवाल है - स्वाभिमान जरुरी है या रोटी.
कृपया जवाब जरुर दीजिये .
Tuesday, May 4, 2010
आग पानी और कुंए
लोग दौड़ रहे है बाल्टियाँ , घड़े , मटके , भगौने लेकर
जिसको जो मिला वही ले चला
आग बुझानी है किसी भी हाल में
नन्हकू की टुटही मडैया ,
रामदीन की गैया ,
भरोसे की चौपाल ,
अम्मा का बरोठा ,
सब धू -धू जल रहा है .....................
सरकारी नल पर लगी है लाइन
एक बार में एक ही बाल्टी भरेगी
आग तब तक और बढ़ेगी
क्या करें लोग ????????????????????????????????
आराम के लोभ में भूल गए पुरानी थाती
सूख गए सारे कुंए , तालाब
जंहा एक एक बार में दस दस बाल्टियाँ भरती थीं
बुझा लिए जाते थे गाँव के गाँव
अब तो बस वही सरकारी नल हैं
जो आग तो क्या प्यास भी नहीं बुझा पाते .
जैसे जलते रहते हैं कंठ , जलते रहेंगे गाँव
हम तमाशबीन बन बस देखते रह जायेंगे
हाथों में ख़ाली बर्तन लिए लाइन लगायेंगे..
Monday, March 15, 2010
Mahila arakshan aur adiwasi mahilaon ke vichar
इस बीच एक बहुत बड़ी घटना हुई. राज्य सभा में महिला बिल का पास होना. इस बारे में मैंने एक आदिवासी गाँव में महिलाओं के एक ग्रुप में बात कि . सबने बहुत ख़ुशी ख़ुशी बात सुनी .
एक ने कहा " क्या अब सब अन्नाज , सब्जी , डालें सस्ती हो जाएँगी ?
दूसरी " अरे नहीं नहीं , अब गाँव में हमें पानी और बिजली मिलने लगेगा . अब पिने का पानी साफ होकर मिलेगा . पानी भरने और नहाने तालाब नहीं जाना होगा. :" सब बहुत खुश थी . अरे अब सब सुविधाएं हम औरतों को मिलने लगेंगी.
तभी उनमे एक बोली " ज्यादा खुश होने कि जरुरत नहीं है . कुछ नहीं बदलने wala . --
ये कुछ भी होता रहे हमें न तो मौका मिलेगा न ही हौसला अफजाई . सदन में वही बैठेंगी जिनके पति पहले से वंहा बैठे है. या वे जाएँगी जो बड़े लोगो के यंहा मजूरी करते है. बड़े लोग उनके औरत होने का फायदा उठाएंगे और वे कठपुतली बन दूसरों के इशारों पर नाचती रहेंगी .
हमें इतने सालों से एस टी के नाम पर रिसर्वेसन दिया गया है . फिर भी हमारे घरों में आज भी पत्ता , फूस , लकड़ी और दो चार बर्तनों के साथ बहुत सारी बीमारियाँ , कर्जे का बोझ , बच्चों कि भूख , गन्दा पानी ओर नंगे बदन के सिवा कुछ नहीं होता . नेता लोग राजधानी में हमारी भीड़ लगाते हैं , हमारे नाम पर करोड़ों कमाते हैं और हम अपनी भूख और गरीबी के कारन उनके हाथ का निवाला बन जाता है. हमारे पेट पिचके ही रहते हैं और उनके फूलते जाते हैं.
और अब इस महिला रिसर्वेसन के नाम पर हम औरतों के शरीरों के साथ भी khilead होगा. हम शारीर से उपस्थित होंगे उनके साथ हमारे निर्णय उनके बंधक होंगे.
तब क्या कुछ बदल पायेगा हमारे लिए?????????????????????
Tuesday, February 2, 2010
हिंदुस्तान हिन्दी में क्षमा शर्मा के लेख पर
आज हिंदुस्तान पेपर में आपका लेख प्रदुषण और जेनेवा कि प्रभातफेरी पढ़ा . सच में लेख दिल को छू gaya . आपने जिन बिन्दुओं कि और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है वह वास्तव में बहुत बड़ी समस्याएं है. हम विकास के नाम पर जिस अंधे कुएं में छलांग लगा रहे है वह हमें विनाश के अलावा कंही और नहीं ले जाता. प्रदुषण के कारन अस्थमा जैसी गंभीर बिमारियों से जूझते हुए बच्चे इस देश का भविष्य है. जितनी बड़ी गाड़ी उतना बड़ा आदमी जैसे जुमले हमारे यंहा आदमी कि पहचान बताते है . अब आदमी का बड़प्पन उसके काम , उसके विचारों से नहीं बल्कि उसके द्वारा फैलाये जा रहे प्रदुषण से आंकी जाती है .
बड़ी गाड़ी - बड़ा आदमी
ढेर साडी फक्ट्रियां - बड़ा आदमी
लाल बत्ती के पीछे दौड़ती सैकड़ों गाड़ियाँ - बहुत बड़ा आदमी
आब बताइए इस देश का आम आदमी कैसे नहीं बड़ा बनने के बारे में सोचेगा . और अगर वह सोचता है तो क्या बुरा करता है . आखिर बड़े होने का हक सबको है .
प्रदुषण , ग्लोबल वार्मिंग जैसे विषय बड़े आदमियों के दिल बहलाव का हिस्सा है . इसी बहाने कोपेन हेगेन जैसे बड़े सम्मलेन होते है , बड़े काम होते है पर देश और यह दुनिया एक इंच भी आगे नहीं बढती.
Monday, January 11, 2010
नेताओ का पर्सनालिटी टेस्ट
हमारे नेता सदन में गाली देते है , कुर्सियां फेकते है , सिर फोड़ते है , हाथ पाई करते है। और तो और राष्ट्र भाषा के प्रयोग पर गाल लाल कर देते है । ये वही लोग हैं जिन्हें हम अपना प्रतिनिधि बनाकर सदन में भेजते हैं।
सवाल यह है कि गलती किसकी है ? हमारी या उन नेताओं कि जो कभी कभी अपना असली चेहरा दिखा देते है ।
अब क्या हम ये गलती दोहराते रहेंगे , या आँख बंद करके बैठे रहेंगे ।
क्या नेताओं को चुनाव नोमिनेसन के पहले पर्सोनालिटी टेस्ट होना चाहिए ?????????
आप क्या सोचते है , जरुर बताइए ...
Sunday, January 10, 2010
रूह का रिश्ता
किसी की लाइने है " जिस्म से रूह का रिश्ता भी अजब होता है , उम्र भर साथ रहे , फिर भी तार्रुफ न हुआ"।
कुछ ऐसा ही होता है उन पुरुषों का जो कभी किचन के भीतर nahi जाते। कभी एक कप चाय बनानी पड़े तो हाथ पाँव फूळ जाते हैं। लेकिन उन पुरुषो को धन्यवाद् जिन्होंने नए साल में जिस्म से रूह का तार्रुफ karane का संकल्प लिया हो। और जिन्होंने संकल्प नही लिया है वे ले सकते है। अभी देर नही हुई..........
नए साल पर शुभकामनायें देना तो पुरानी बात है , बात नई यह है की कुछ लोगों ने नए साल पर गालियाँ भी दी। त्यौहार था गणेश चतुर्थी का । कुछ समाजों में मान्यता है , की यदि किसी का भला करना है , तो उसे बुरी गालियाँ दो। जैसे हे भगवान वह बीमार हो जाए , तो उसकी उम्र लम्बी होगी ।इश्वर करे हमारे देश में ऐसी मान्यताएं बनी रहे , ताकि कुछ नया होता रहे , और कुछ नया होने की संभावनाएं बनी रहे.
Monday, December 21, 2009
नवीन जोशी के ब्लॉग पर comment
नवीन जोशी के ब्लॉग पर कमेन्ट -
कुछ कहने के लिए हमारे पास शब्द चाहिए , शब्दों के लिए विचार चाहिए , विचारों के लिए चिंतन चाहिए और चिंतन के लिए वक्त चाहिए. इस आपाधापी भरे समय में चिंतन के लिए समय निकालने के लिए कौन तैयार होगा. इस उपभोक्तावादी समाज में लोग सिर्फ पैसे के बारे में सोचना चाहते है.एक कथा कहती हूँ. एक किसान जेठ की भरी दोपहरी में खेत की मेड पर एक पेड़ की chhaya में आराम से सो रहा था. उसी समय एक समाज सेवक ( अरे भाई संस्था वाले लोग) किसान के पहुंचे और उसे जगाया. किसान बोला सरे भाई क्यों उठा दिए? अभी तो आँख लगी थी.समाज सेवक जी बोले , अरे तुम जैसे लोगो के कारन ही हमारे देश का बुरा हाल है . तू सो सो कर सारा समय barbad कर रहे हो. अरे कुछ कम -धाम करो. किसान बोला" भैया काम करके क्या होगा?" समाज सेवक " काम करोगे तो पैसा आयेगा ".किसान - पैसा से क्या होगा?समाज सेवक- पैसा आयेगा तो खुशहाली आयेगी. चिंता फिकर कम होगी , घर में चैन होगा तो आराम की नीद आयेगी.किसान - भैया , खेत में हाड़ तोड़ मेहनत करके आराम की नीद ही तो सो रहा था , तब आपने आकर जगा दिया.समाज सेवक की ड्यूटी पूरी हो चुकी थी , जिन्होंने पुरे देश को जागृत करने का प्रोजेक्ट ले रखा था.
तो साहब किस्से तो बहुत है , हा हमें किसे जगाने और किसे सुनाने की jarurat है यह कौन तय करेगा??????????????????